जोग जग्य जप तप बरत, तीरथ नेम अचार।
चार बेद षट सास्त्र प्रभु, तुम किरपा की लार॥
- श्री दयाबाई (शुक संप्रदाय के श्री चरण दास जी की शिष्या)
भले ही कोई योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और तीर्थों की यात्रा करे, नियम, संयम, सदाचार का पालन करे, चारों वेदों एवं छहों शास्त्रों में पारंगत हो जाए— परंतु, हे प्रभु! आपकी कृपा के बिना यह सब निष्फल ही रहता है।

