यह गति नाँचि-नाँचि लई - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी

यह गति नाँचि-नाँचि लई - श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी

यह गति नाँचि-नाँचि लई।
वृन्दावनमें रास-विलास, सुख बाढ़त सई॥ [1]
भाँति-भाँति राग गावत, सुर अलापत कई।
उरप-तिरप मान लेत, ताता - तत - थई॥ [2]
स्याम सुन्दर करत क्रीड़ा, प्रेम-छटा छई।
कुंभनदास प्रभु गिरधर, छिनु-छिनु प्रीति नई॥ [3]

- श्री कुंभनदास, श्री कुम्भनदास जी की वाणी

ब्रज रस की अद्भुत गति को मैंने नाच-नाच कर प्राप्त किया है। वृन्दावन में रास-विलास में निरंतर रस की वृद्धि हो रही है। [1]

सखियाँ मधुर स्वर में विविध रागों का गायन कर रही हैं और सुर का सुंदर आलाप कर रही हैं। श्री श्यामा-श्याम सुरों के अनुरूप अपनी गति साध रहे हैं, और सखियाँ “तात-तत-थेई” की लयबद्ध ध्वनि से नृत्य को गति दे रही हैं। [2]

श्री श्यामसुंदर की इस रसमयी क्रीड़ा से सम्पूर्ण वातावरण प्रेम की छटा से सराबोर हो गया है। श्री कुंभनदास कहते हैं, प्रभु गिरिधर श्री कृष्ण प्रतिक्षण नवीन प्रेम की वर्षा कर रहे हैं। [3]