(सवैया)
जुग बीत गये बिछुरे से मिले, दिन यों ही गये सब ठल्लव के। [1]
अपनों–अपनों सबहि नें कह्यौ, सपनों सौ भयो सब गल्लभ के॥ [2]
अबकी बनि बानिक खूब गयौ, शरणागत श्री पद पल्लभ के। [3]
‘ध्रुव’ धन्य भयौ ब्रजवासिन के, मुख ते सुन राधिकावल्लभ के॥ [4]
जुग बीत गये बिछुरे से मिले, दिन यों ही गये सब ठल्लव के। [1]
अपनों–अपनों सबहि नें कह्यौ, सपनों सौ भयो सब गल्लभ के॥ [2]
अबकी बनि बानिक खूब गयौ, शरणागत श्री पद पल्लभ के। [3]
‘ध्रुव’ धन्य भयौ ब्रजवासिन के, मुख ते सुन राधिकावल्लभ के॥ [4]
- श्री ध्रुव अलि शरण जी (वृंदावन)
हे प्रभु (श्री राधा-कृष्ण), आपसे विछोह के बाद अनेकों युग बीत गए, दिन व्यर्थ ही ठालेपन (बेकार) में निकलते रहे! [1]
संसार में हर किसी ने यही कहा कि वे ही हमारे अपने हैं, लेकिन वे सब सपने जैसे झूठे निकले। उनके वाक्य केवल शब्दों के मायाजाल निकले, कोई भी सच्चा संबंधी नहीं मिला। [2]
किन्तु इस बार आपकी कृपा से परिस्थितियाँ मेरे अनुकूल हो गईं और मैं आपके चरणकमलों की शरण में आ गया। [3]
श्री ध्रुव अलि शरण जी स्वयं को धन्य मानते हैं कि उन्होंने ब्रजवासियों के मुख से श्री राधिकावल्लभ की महिमा का श्रवण किया। [4]

