मोहि भरोसौ स्वामी जी को ।
करि हैं अपनों आप बरोबरि, प्रान अधार है पीकौ ॥ [1]
विषे वासना जारि खेह करि, उपजै हैं हित नीकौ ।
श्रीरसिकविहारी-बिहारिनि तन मन, और लगे सब फीको ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (127)
मुझे तो ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी पर विश्वास है । उनकी करुणा ऐसी है कि वे जिस पर कृपा करते हैं, उसे भी अपने समान बना लेते हैं । अर्थात् जिस प्रकार वे स्वयं श्री प्रिया-प्रियतम की सेवा करते हैं, वही सेवा का अधिकार वे अपने कृपापात्र को भी दे देते हैं। उनके प्राणों का आधार युगल नित्य विहार है । [1]
वे साधक के चित्त से समस्त विषय वासनाओं को मिटा कर, उसके हृदय में श्री श्यामा-कुंजबिहारी के प्रति अनन्य प्रेम भर देते हैं। श्री ललित किशोरी देव कहते हैं—“जब स्वामी जी की कृपा होती है, तब रसिक के तन, मन और प्राणों में केवल बिहारी-बिहारिनी ही बसते हैं, और शेष संसार नीरस लगने लगता है।” [2]
करि हैं अपनों आप बरोबरि, प्रान अधार है पीकौ ॥ [1]
विषे वासना जारि खेह करि, उपजै हैं हित नीकौ ।
श्रीरसिकविहारी-बिहारिनि तन मन, और लगे सब फीको ॥ [2]
- श्री ललित किशोरी देव, श्री ललित किशोरी देव जू की वाणी, सिद्धांत के पद (127)
मुझे तो ललिता अवतार स्वामी श्री हरिदास जी पर विश्वास है । उनकी करुणा ऐसी है कि वे जिस पर कृपा करते हैं, उसे भी अपने समान बना लेते हैं । अर्थात् जिस प्रकार वे स्वयं श्री प्रिया-प्रियतम की सेवा करते हैं, वही सेवा का अधिकार वे अपने कृपापात्र को भी दे देते हैं। उनके प्राणों का आधार युगल नित्य विहार है । [1]
वे साधक के चित्त से समस्त विषय वासनाओं को मिटा कर, उसके हृदय में श्री श्यामा-कुंजबिहारी के प्रति अनन्य प्रेम भर देते हैं। श्री ललित किशोरी देव कहते हैं—“जब स्वामी जी की कृपा होती है, तब रसिक के तन, मन और प्राणों में केवल बिहारी-बिहारिनी ही बसते हैं, और शेष संसार नीरस लगने लगता है।” [2]

