(राग मल्हार)
सघन बन झूलें दोऊ सुकुमार।
हिय हरषत छबि निरखि परस्पर, छिन छिन बाढ़त प्यार ॥ [1]
कबहुँ मुदित मन तान लेत मिलि, होत सखी बलिहार।
नारायण द्रुम बेलि सुहावनि, हरित किये श्रृंगार ॥ [2]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (24)
वृंदावन के हरे-भरे, सघन वन में युगल किशोरी श्री राधा-कृष्ण एक संग झूला झूल रहे हैं। उनके हृदय हर्षोन्माद से भरे हुए हैं, वे बार-बार एक-दूसरे की छवि निहार रहे हैं, और प्रत्येक क्षण उनका प्रेम और अधिक बढ़ता जा रहा है। [1]
कभी-कभी वे परम आनंदित होकर मधुर गान करने लगते हैं, जिसे देखकर rसखियाँ भावविभोर होकर स्वयं को बलिहार कर देती हैं। श्री नारायण स्वामी कहते हैं—वृक्ष, लताएँ आदि अनुपम शोभा से युक्त हैं, और उनके श्रृंगार सहित चारों ओर हरियाली फैली हुई है। [2]
सघन बन झूलें दोऊ सुकुमार।
हिय हरषत छबि निरखि परस्पर, छिन छिन बाढ़त प्यार ॥ [1]
कबहुँ मुदित मन तान लेत मिलि, होत सखी बलिहार।
नारायण द्रुम बेलि सुहावनि, हरित किये श्रृंगार ॥ [2]
- श्री नारायण स्वामी, ब्रज विहार, वन झूलन लीला (24)
वृंदावन के हरे-भरे, सघन वन में युगल किशोरी श्री राधा-कृष्ण एक संग झूला झूल रहे हैं। उनके हृदय हर्षोन्माद से भरे हुए हैं, वे बार-बार एक-दूसरे की छवि निहार रहे हैं, और प्रत्येक क्षण उनका प्रेम और अधिक बढ़ता जा रहा है। [1]
कभी-कभी वे परम आनंदित होकर मधुर गान करने लगते हैं, जिसे देखकर rसखियाँ भावविभोर होकर स्वयं को बलिहार कर देती हैं। श्री नारायण स्वामी कहते हैं—वृक्ष, लताएँ आदि अनुपम शोभा से युक्त हैं, और उनके श्रृंगार सहित चारों ओर हरियाली फैली हुई है। [2]

