श्री हरिदास अनन्य जे, जिनकै प्रेम प्रधान ।
प्यारी-पिय निजु सखिनि की, रूप माधुरी पान ॥
- श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (31)
जो रसिकजन स्वामी श्री हरिदास जी के पूर्ण रूप से अनुगामी होते हैं, उनकी प्रधानता केवल प्रेम की ही होती है । वे सखीभाव को अंगीकार कर, प्रिया-प्रियतम को नित्य लाड़ लड़ाते हुए, उनकी रूप-माधुरी का सतत पान करते रहते हैं ।
प्यारी-पिय निजु सखिनि की, रूप माधुरी पान ॥
- श्री रूप सखी, सिद्धांत के दोहा (31)
जो रसिकजन स्वामी श्री हरिदास जी के पूर्ण रूप से अनुगामी होते हैं, उनकी प्रधानता केवल प्रेम की ही होती है । वे सखीभाव को अंगीकार कर, प्रिया-प्रियतम को नित्य लाड़ लड़ाते हुए, उनकी रूप-माधुरी का सतत पान करते रहते हैं ।

