स्वामिनि तोर सुहाग मनाऊँ।
श्रीवृषभान दुलारी सेवा जब-जब यही जग आऊँ॥ [1]
अतर फुलेल अरगजा सुन्दर पिय प्यारी उबटाऊँ।
वीरी सरस लगाय पवाऊँ रस के बैन सुनाऊँ॥ [2]
प्रीतम सो नित लाड़ लड़ाऊँ टहलनी होय अपनाऊँ।
'श्यामा सखी' दरबार रहूँगी जूँठन आस धराऊँ॥ [3]
श्रीवृषभान दुलारी सेवा जब-जब यही जग आऊँ॥ [1]
अतर फुलेल अरगजा सुन्दर पिय प्यारी उबटाऊँ।
वीरी सरस लगाय पवाऊँ रस के बैन सुनाऊँ॥ [2]
प्रीतम सो नित लाड़ लड़ाऊँ टहलनी होय अपनाऊँ।
'श्यामा सखी' दरबार रहूँगी जूँठन आस धराऊँ॥ [3]
- श्री श्यामा सखी
हे स्वामिनी (श्री राधे)! मैं सदा आपके सुहाग (दाम्पत्य रस) का उत्सव मनाती रहूँ। जन्म-जन्मांतर में, हे श्री वृषभानु नंदिनी! मुझे आपकी निष्काम सेवा प्राप्त हो। जब-जब भी मैं इस जग में आऊँ, आपकी ही सेवा करती रहूँ। [1]
मैं सुगंधित लेप एवं इत्र तैयार करूँ, उन्हें प्रेमपूर्वक आप और आपके प्रियतम पर लगाऊँ। आपको सुंदर पान का भोग अर्पित करूँ और रसपूर्ण बातें सुनाऊँ। [2]
प्रतिदिन मैं स्नेहपूर्वक आपकी और ठाकुरजी को ही लाड़ लड़ाऊँ, महल की टहलनी बनकर नित्य सेवा करती रहूँ। श्री श्यामा सखी कहती हैं—हे श्री राधे! मैं सदा आपके दरबार में ही रहूँ और आपकी ही जूठन प्राप्त करने की मधुर आशा रखूँ। [3]
मैं सुगंधित लेप एवं इत्र तैयार करूँ, उन्हें प्रेमपूर्वक आप और आपके प्रियतम पर लगाऊँ। आपको सुंदर पान का भोग अर्पित करूँ और रसपूर्ण बातें सुनाऊँ। [2]
प्रतिदिन मैं स्नेहपूर्वक आपकी और ठाकुरजी को ही लाड़ लड़ाऊँ, महल की टहलनी बनकर नित्य सेवा करती रहूँ। श्री श्यामा सखी कहती हैं—हे श्री राधे! मैं सदा आपके दरबार में ही रहूँ और आपकी ही जूठन प्राप्त करने की मधुर आशा रखूँ। [3]

