जापै चढ़े युगल को रंग - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (69)

जापै चढ़े युगल को रंग - श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (69)

(राग झंझौटी)
जापै चढ़े युगल को रंग।
भूल जाय त्रिभुवन सुख पल में, निरखत दम्पति अंग॥ [1]
तोरि कानि कुल फारे घूंघट, नैन नीर सुर भंग।
ललित लड़ैती नाचै गावै, मतवारन से ढंग॥ [2]

- श्री ललित लड़ैती, श्री किशोरी कृपा कटाक्ष, विनय (69)

जिस पर युगल (श्री राधा-कृष्ण) का रंग चढ़ जाता है, वह उनके अंग-सौंदर्य को निहारकर त्रिभुवन की समस्त सुख-संपत्ति और वैभव को एक क्षण में ही विस्मृत कर देता है। [1]

वह सभी कुल-गौरव और वेद की मर्यादाओं को त्यागकर, आँसू बहाता हुआ श्यामा-श्याम का स्मरण करता है। श्री ललित लड़ैती कहते हैं कि ऐसा जीव श्यामा-श्याम के प्रेम में मतवालेपन से नाचता और गाता है। [2]