पल बिछुरें न कल परें, ढरे रहैं रसढारि।
सहज साँवरी गोरि यह, जोरी परम उदारि॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, उत्साह सुख (37)
सहज साँवरी गोरि यह, जोरी परम उदारि॥
- श्री हरिव्यास देवाचार्य, महावाणी, उत्साह सुख (37)
सहज रंगीली साँवरी गोरी जोरी परम उदार है। ये दोनों इस प्रकार के रस में ढरे हुए हैं कि यदि ये एक पल के लिये भी बिछुर जाएँ तो इन्हें कल नहीं पड़ती है।

