तेही छिनु बृषभनु-किसोरी - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (511)

तेही छिनु बृषभनु-किसोरी - श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (511)

(राग कान्हरो)
तेही छिनु बृषभानु-किसोरी,
गिरिधर पिय के मन बुधि हरति।
जिहि छिनु नवल विपिन-वीथिनि महँ,
उझकति तू अभिसरति॥ [1]
नुपुर-धुनि पीयूष पूरिके,
कान-सरोबर नवरँग भरति।
"कृष्णदास" स्वामिनी! वर नागर,
रसिक-किसोर नयन अनुसरति॥ [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (511)

हे वृषभानु किशोरी श्री राधा! जिस क्षण आप नवल-वृंदावन की कुंज-वीथियों में गोवर्धनधारी श्रीकृष्ण से मिलती हैं, उसी क्षण उनका चित्त और बुद्धि पूर्ण रूप से हरण कर लेती हैं। [1]

आपके नुपुर की मधुर ध्वनि के रसामृत से श्री कृष्ण के कान-सरोवर में अनेक रंग भर जाते हैं । श्री कृष्णदास कहते हैं, "हे रस की अधीश्वरी श्री राधा! रसिक-शेखर नव-नागर श्री कृष्ण चंद्र आपके नेत्रों के वशीभूत होकर उन नेत्रों की कमान का अनुसरण करने लगते हैं।" [2]