जो पै करम ही मेरे भारी ।
तौ राधे साहिवनी मेरी, साहिवी कहा तिहारी ।
शरणागत वपु होत अलौकिक, कहत पुराण पुकारी ॥ [1]
बार-बार मेरी विनती सुनिये, श्रीवृषभानु दुलारी ।
अली किशोरी कौं कीजे अब, श्रीवन-रज अधिकारी॥ [2]
- श्री किशोरी अलि
हे स्वामिनी श्री राधे! यदि मेरे कर्म उत्तम ना हों, तो ही मैं आपकी साहिबिनी रूप शरणागति को त्यागकर अपनी स्वेच्छा से चलने का दुस्साहस करूँगा। अर्थात् यदि मेरी दुर्गति निश्चित हो, तभी मैं आपकी आज्ञा को त्यागकर अपने मन से चलूँगा । पुराण भी बारम्बार उद्घोष करते हैं कि जो शरणागत होता है, केवल वही दिव्यता को प्राप्त करता है, अन्य कोई नहीं। [1]
हे वृषभानु नंदिनी श्री राधे! मैं बार-बार आपसे यही विनय करता हूँ — कृपा करके मुझे भी वृंदावन की रज प्राप्त करने का अधिकारी बनाइए, अर्थात् यदि आपकी इच्छा हो तो मुझे श्री वृंदावन में वास का सौभाग्य दीजिए। [2]
तौ राधे साहिवनी मेरी, साहिवी कहा तिहारी ।
शरणागत वपु होत अलौकिक, कहत पुराण पुकारी ॥ [1]
बार-बार मेरी विनती सुनिये, श्रीवृषभानु दुलारी ।
अली किशोरी कौं कीजे अब, श्रीवन-रज अधिकारी॥ [2]
- श्री किशोरी अलि
हे स्वामिनी श्री राधे! यदि मेरे कर्म उत्तम ना हों, तो ही मैं आपकी साहिबिनी रूप शरणागति को त्यागकर अपनी स्वेच्छा से चलने का दुस्साहस करूँगा। अर्थात् यदि मेरी दुर्गति निश्चित हो, तभी मैं आपकी आज्ञा को त्यागकर अपने मन से चलूँगा । पुराण भी बारम्बार उद्घोष करते हैं कि जो शरणागत होता है, केवल वही दिव्यता को प्राप्त करता है, अन्य कोई नहीं। [1]
हे वृषभानु नंदिनी श्री राधे! मैं बार-बार आपसे यही विनय करता हूँ — कृपा करके मुझे भी वृंदावन की रज प्राप्त करने का अधिकारी बनाइए, अर्थात् यदि आपकी इच्छा हो तो मुझे श्री वृंदावन में वास का सौभाग्य दीजिए। [2]

