सहजो सुमिरन कीजिए, हिरदे माहिं दुराय ।
होठ होठ सूँ ना हिलै, सकै नहीं कोई पाय ॥
- श्री सहजो बाई
सुमिरन चुपचाप, छिपा कर मन ही मन करना चाहिये। न जीभ हिलनी चाहिये और न होंठ हिलने चाहिए। सुमिरन इस प्रकार करना चाहिये कि केवल सुमिरन करने वाले को और जिसका सुमिरन किया जा रहा है यानी उस प्रभु को पता हो। संसार को जताने के लिये सुमिरन करना तो अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक जाना है।
होठ होठ सूँ ना हिलै, सकै नहीं कोई पाय ॥
- श्री सहजो बाई
सुमिरन चुपचाप, छिपा कर मन ही मन करना चाहिये। न जीभ हिलनी चाहिये और न होंठ हिलने चाहिए। सुमिरन इस प्रकार करना चाहिये कि केवल सुमिरन करने वाले को और जिसका सुमिरन किया जा रहा है यानी उस प्रभु को पता हो। संसार को जताने के लिये सुमिरन करना तो अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक जाना है।

