(कवित्त)
जाति पाँति नाना भांति कुल अभिमान तजि,
जाति पाँति नाना भांति कुल अभिमान तजि,
निशिदिन शीश कौं नवाऊँ रसिकन में। [1]
सेवाकुञ्ज मण्डल पुलिन वंशीवट,
निधिवन औ समीर धीर विचरौं मगन में॥ [2]
लता द्रुम हेरौं राधाकृष्ण कहि टेरौं,
रज लपटाऊँ तन में और सुख पाऊँ मन में। [3]
एहो राधावल्लभ जू तुमही सों विनती है,
जैसें बनै तैसें मोहि राखो वृन्दावन में॥ [4]
- श्री चंद्र लाल गोस्वामी जी, अभिलाष बत्तीसी
जाति, पंथ और कुल का अभिमान त्यागकर, मैं नित्य रसिकों के चरणों में श्रद्धापूर्वक सिर नवाऊँगा। [1]
मैं सेवाकुंज, रासमंडल, यमुना पुलिन, वंशीवट, निधिवन और धीर-समीर जैसे दिव्य स्थलों में प्रेमपूर्वक विचरण करूँगा। [2]
वृक्षों और लताओं को निहारते हुए राधा-कृष्ण को पुकारूँगा, और अपने शरीर पर रज लिपटकर मन में सुख प्राप्त करूँगा। [3]
हे श्री राधावल्लभ! मेरी आपसे यही करबद्ध विनती है कि चाहे जैसे भी बने, मुझे सदा वृंदावन में ही रखो। [4]

