खान-पान-परिधान मैं, जीवन गयौ सब बीति।
ज्यौं बिट पर-तिय-सँग बस्यौ, भोर भए भई भीति॥
- श्री सूरदास, सूर सागर
खाने-पीने और भोग-विलास में सम्पूर्ण जीवन यूँ ही व्यर्थ बिता दिया। जैसे कोई दुराचारी व्यक्ति रात किसी पराई स्त्री के साथ बिताकर सुबह भयभीत हो उठे, वैसे ही जब मृत्यु रूपी सवेरा निकट आता है, तो मायारूपी परस्त्री में अनुरक्त होकर जीवनरूपी रात्रि व्यर्थ बिताने वाला जीव भय से काँपने लगता है।
ज्यौं बिट पर-तिय-सँग बस्यौ, भोर भए भई भीति॥
- श्री सूरदास, सूर सागर
खाने-पीने और भोग-विलास में सम्पूर्ण जीवन यूँ ही व्यर्थ बिता दिया। जैसे कोई दुराचारी व्यक्ति रात किसी पराई स्त्री के साथ बिताकर सुबह भयभीत हो उठे, वैसे ही जब मृत्यु रूपी सवेरा निकट आता है, तो मायारूपी परस्त्री में अनुरक्त होकर जीवनरूपी रात्रि व्यर्थ बिताने वाला जीव भय से काँपने लगता है।

