परमेस्वर परतीति नहिं - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (22)

परमेस्वर परतीति नहिं - श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (22)

(कुंडलिया)
परमेस्वर परतीति नहिं, पैसन की परतीति।
बिनु भगवत भवनिधि परे, गेही कहा अतीत॥ [1]
गेही कहा अतीत, स्याम सर्बसु धन भूले।
कनक-कामिनी देखि, रहैं निसि-बासर फूले॥ [2]
दिन दस प्रभुता पाइ, कहैं हम ही सर्वेस्वर।
महा मोह-मद पियें, जियें कैसे परमेस्वर॥ [3]
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्य निश्चयात्मक ग्रंथ [उतरार्द्ध] (22)

जिन व्यक्तियों का भगवान् पर विश्वास नहीं है और जिनका भरोसा केवल धन-दौलत पर टिका है — वे चाहे गृहस्थ हों या गृहत्यागी, विरक्त कहलाते हों या संसार से विमुख दिखाई देते हों — वास्तव में वे सभी संसार-सागर में ही डूबे हुए हैं। [1]

ये यह भूल चुके हैं कि समस्त प्राणियों के लिए यदि कोई वास्तविक और सर्वोपरि संपत्ति है, तो वह केवल श्री श्यामाकुंज बिहारी हैं। परंतु दुर्भाग्यवश ये लोग कंचन और कामिनी के मोह में भटकते फिरते हैं। भौतिक सुख-साधनों और रूप-यौवन से संपन्न स्त्रियों को देखकर ये दिन-रात आत्ममुग्ध रहते हैं। [2]

श्री भगवत रसिक जी कहते हैं, यदि इन्हें कुछ समय के लिए थोड़ी सी ऐश्वर्य-सम्पदा मिल जाए, तो अहंकारवश यह कहने लगते हैं—“हम ही सबके स्वामी हैं और यह सारा लोक हमारे अधीन है।” हे भगवन्! ऐसे लोग महामोह रूपी भयंकर मदिरा का पान कर रहे हैं — फिर भला यह कब तक और किस प्रकार टिक सकेगा? [3]