ऐसौ और सनेही कौन - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (97)

ऐसौ और सनेही कौन - श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (97)

(राग कान्हारो)
ऐसौ और सनेही कौन।
रँगे एकही रंग रँगीलौ, तजि कैं विभौ चतुरदस भौंन ॥ [1]
छिन-छिन चरन-कमल सहरावत, कबहुँ करत पट-पीत सौं पौंन।
ऐसौ प्रेम कहा कोउ बरनै, जहाँ सकल सुख गौंन ॥ [2]
अद्भुत रूप माधुरी निरखत, भरि-भरि लोइनि दौंन ।
'हित ध्रुव' तजि मर्जाद बड़ाई, ह्वै रहै सबै बात में मौन॥ [3]

- श्री हित ध्रुवदास, बयालीस लीला, पद्यावली (97)

रसिक शिरोमणि श्रीलाल जी (श्री कृष्ण) के अतिरिक्त ऐसा और कौन रँगीला-प्रेमी है, जो चौदह लोकों के ऐश्वर्य-वैभव तथा स्वामित्त्व का त्याग करके केवल एक प्रेम के ही रंग में रँग गया हो।[1]

जो प्रतिक्षण प्राण-प्रिया के चरण-कमलों को सहलाता हो और फिर कभी अपने पीत-पट से उन पर मृदु-मृदु बयार करता हो। भला इनके ऐसे प्रेम का यदि कोई वर्णन करना चाहे तो क्या वर्णन करे, जिसके समक्ष उन्होंने अपने समस्त सुखों को सर्वथा पीछे धकेल दिया है। [2]

ऐसे रूप-लालची प्रियतम हैं, जो नित्य-निरन्तर नवल-प्रिया की अनुपम रूप-माधुरी का अपने नयन-पात्रों में भर-भर पान करते रहते हैं। श्री ध्रुवदास जी कहते हैं कि उन्होंने लोक- वेद की मर्यादा एवं अपनी मान-बड़ाई का तो सर्वथा त्याग कर ही दिया है, अपितु सब ओर से अपने आपको समेट कर श्री प्रिया-प्रेम में ही तल्लीन हैं। [3]