मुकुट लटक अटकी मनमाहीं - श्री सहजो बाई

मुकुट लटक अटकी मनमाहीं - श्री सहजो बाई

मुकुट लटक अटकी मनमाहीं।
नृत्यत नटवर मदन मनोहर, कुंडल झलक पलक बिथुराई॥ [1]
नाक बुलाक हुलक मुक्ताहल, होंठ मटक गति भौंह चलाई।
ठुमुक-ठुमुक पग धरत धरनि पर, बाँह उठाय करत चतुराई॥ [2]
झुनक-झुनक नूपुर झनकारत, ता-ता थेई-थेई रीझ रिझाई।
चरनदास ‘सहजो’ हिय अंतर, भवन करौ जित रहौं सदाई॥ [3]

- श्री सहजोबाई

श्रीकृष्ण की लटकती हुई मुकुट की छवि मन को मोह लेती है। नटवर नागर श्रीकृष्ण नृत्य करते हुए इतने सुंदर लग रहे हैं जिससे साक्षात कामदेव भी भी मोहित हो जाए ।  उनके कुंडल झिलमिला रहे हैं और पलकें चंचलता से फड़क रही हैं। [1]

उनकी नाक की मोतियों वाली बाली झूल रही है, होंठ लचक से हिल रहे हैं और भौंहें अद्भुत गति से चल रही हैं। वे ठुमकते हुए धरती पर पग रख रहे हैं, बाँहें उठाकर चतुर भाव से नृत्य कर रहे हैं। [2]

श्रीकृष्ण के नूपुर झनकार कर रहे हैं, “ता-ता थेई-थेई” की लय में वे सभी को रिझा रहे हैं। श्री सहजोबाई, अपने गुरुदेव श्री चरणदास जी से प्रार्थना करती हैं कि श्रीकृष्ण की यह सुंदर छवि उनके हृदय रूपी भवन में सदा के लिए बस जाए। [3]