उरज उतंग अति भरित भरे से अंग -  श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी

उरज उतंग अति भरित भरे से अंग - श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी

(कवित्त)
उरज उतंग अति भरित भरे से अंग,
अधर सुरंग सों रंगी सी मति जाति हैं । [1]
ऊँची गुँथी वेणी सों तनेनी भौंह भई भरी,
आई भरी छवि हँसि लसि इतराति हैं॥ [2]
‘वल्लभ रसिक’ दोऊ, सनमुख मुख सनें,
चकित थकित कित दिवस कित राति हैं। [3]
नैननि सिहानी ललचानी मुस्कानी,
तरसानी सरसानी आनि-आनि दरसाति हैं॥ [4]

- श्री वल्लभ रसिक, श्री वल्लभ रसिक जी की वाणी

श्री राधा के उरोज अत्यंत उन्नत और पूर्ण रूप से भरे हुए हैं, जिनसे उनका संपूर्ण शरीर सौंदर्य से परिपूर्ण हो उठा है। उनके सुंदर लाल होंठों को देखकर मानो श्री कृष्ण का चित्त उन्हीं के रंग में रंग जाता है, और बुद्धि मोहित हो उठती है। [1]

उनकी ऊँची गुँथी वेणी से भौंहें ऐसी प्रतीत हो रही हैं मानो खिंचकर तन गई हैं । वे मुस्कराती, दमकती और इठलाती हुई सुंदर रूप धारण कर आ रही हैं । [2]

श्री राधा-कृष्ण, दोनों रसिकजन आमने-सामने आ खड़े हैं और एक-दूसरे को एकटक निहार रहे हैं। श्री कृष्ण ऐसे चकित होकर खड़े हैं, न  उन्हें दिन का होश है न ही रात का, उन्हें इकटक निहारते जा रहे हैं। [3]

श्री राधा के नेत्रों की गरिमा, उनकी उत्कंठा एवं उनकी मोहक मुस्कान आदि को निहार कर श्री कृष्ण के तरसते नेत्र आनंद में विभोर हो रहे हैं । [4]