स्याम बतायौ नैंन में रही समुझि सुकुँवारि- श्रीभट्ट देवाचार्य, युगल शतक (30)

स्याम बतायौ नैंन में रही समुझि सुकुँवारि- श्रीभट्ट देवाचार्य, युगल शतक (30)

स्याम बतायौ नैंन में, रही समुझि सुकुँवारि।
चरन लग्यौ जब कह्यौ तब, हरषी लाल निहारि॥

- श्रीभट्ट देवाचार्य, युगल शतक (30)

श्रीश्यामसुंदर ने नेत्रों के संकेतों द्वारा अपनी विनती मानिनी श्रीराधा के समक्ष प्रस्तुत की, और श्रीप्रियाजी ने भी नयनों के संकेत से ही उस विनती को स्वीकार कर लिया। किंतु जब श्रीकृष्ण ने अत्यंत विनम्र होकर अपना मस्तक श्रीराधा के श्रीचरण-कमलों पर रखकर मनुहार की, तब लाड़िलीजी अपने मान का परित्याग कर पूर्णतः प्रसन्न हो उठीं।