(राग मुलतानी धनाश्री- तिताला)
मेरी सुधि लीजौ हो, ब्रजराज।
और नहीं जग मैं कोउ मेरौ, तुमहिं सुधारन काज ॥ [1]
गनिका, गीध, अजामिल तारे, सबरी औ गजराज ।
सूर पतित पावन करि कीजै, बाहँ गहे की लाज ॥ [2]
- श्री सूरदास, सूर सागर
हे व्रज के नाथ, श्री कृष्ण! कृपा कर मेरी सुधि लीजिए। इस संसार में मेरा और कोई नहीं है । आप ही मेरी बिगड़ी को बनाने वाले हैं! [1]
आपने अनेकों का उद्धार किया है जिनमें गणिका, गीध, अजामिल, शबरी, गजराज आदि हैं । इस पतित सूरदास को भी पावन बनाकर हाथ पकड़े हुए की लज्जा रख लीजिये। [2]
मेरी सुधि लीजौ हो, ब्रजराज।
और नहीं जग मैं कोउ मेरौ, तुमहिं सुधारन काज ॥ [1]
गनिका, गीध, अजामिल तारे, सबरी औ गजराज ।
सूर पतित पावन करि कीजै, बाहँ गहे की लाज ॥ [2]
- श्री सूरदास, सूर सागर
हे व्रज के नाथ, श्री कृष्ण! कृपा कर मेरी सुधि लीजिए। इस संसार में मेरा और कोई नहीं है । आप ही मेरी बिगड़ी को बनाने वाले हैं! [1]
आपने अनेकों का उद्धार किया है जिनमें गणिका, गीध, अजामिल, शबरी, गजराज आदि हैं । इस पतित सूरदास को भी पावन बनाकर हाथ पकड़े हुए की लज्जा रख लीजिये। [2]

