प्यारी तेरी छबि पर रबि ससि वारौं ।
महल-निकुंज सेज प्रीतम संग, इकटक नित्य निहारौं ॥ [1]
लता तमाल सुघन दांमिनि दुति, रतिपति की गति टारौं ।
श्री वृन्दावन नित्य बिहारिन, रूप दृगनि मैं धारौं ॥ [2]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (251)
हे प्यारी जू (श्री राधा)! तुम्हारे अनुपम सौंदर्य पर तो मैं सूर्य और चंद्रमा को भी अर्पण कर दूँ। निकुंज महल में सुंदर शय्या पर विराजित तुम्हारे संग प्रियतम की छवि को सदा, एकटक निहारा करूँ — यही मेरी अभिलाषा है।। [1]
प्रियतम श्यामसुंदर के संग तुम्हारी छवि ऐसी प्रतीत होती है मानो लताएँ तमाल वृक्ष से लिपटी हों, अथवा घन के संग दामिनी विराजित हो। इस छवि के समक्ष कामदेव की गति भी फीकी प्रतीत होती है। श्री रूप सखी कहती हैं कि — श्रीधाम वृंदावन में नित्य विहार करने वाली हे नित्य विहारिन जू! मैं सदा के लिए आपके इस स्वरूप को ही अपने नेत्रों में धारण करूँ। [2]
महल-निकुंज सेज प्रीतम संग, इकटक नित्य निहारौं ॥ [1]
लता तमाल सुघन दांमिनि दुति, रतिपति की गति टारौं ।
श्री वृन्दावन नित्य बिहारिन, रूप दृगनि मैं धारौं ॥ [2]
- श्री रूप सखी, श्री रूप सखी जी की वाणी, श्रृंगार रस के पद (251)
हे प्यारी जू (श्री राधा)! तुम्हारे अनुपम सौंदर्य पर तो मैं सूर्य और चंद्रमा को भी अर्पण कर दूँ। निकुंज महल में सुंदर शय्या पर विराजित तुम्हारे संग प्रियतम की छवि को सदा, एकटक निहारा करूँ — यही मेरी अभिलाषा है।। [1]
प्रियतम श्यामसुंदर के संग तुम्हारी छवि ऐसी प्रतीत होती है मानो लताएँ तमाल वृक्ष से लिपटी हों, अथवा घन के संग दामिनी विराजित हो। इस छवि के समक्ष कामदेव की गति भी फीकी प्रतीत होती है। श्री रूप सखी कहती हैं कि — श्रीधाम वृंदावन में नित्य विहार करने वाली हे नित्य विहारिन जू! मैं सदा के लिए आपके इस स्वरूप को ही अपने नेत्रों में धारण करूँ। [2]

