कबहूँ तौ लाड़िली ऐसी कृपा करौ री - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (348)

कबहूँ तौ लाड़िली ऐसी कृपा करौ री - श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (348)

कबहूँ तौ लाड़िली ऐसी कृपा करौ री।
हौं तौ लोटि रहौं कुंजन मग, तुम हिय आइ कैं पाँव धरौ री ॥ [1]
हौं तौ लागि रहौं चरणन सौं, तुम झुकि विहँसि भुजा पकरौ री।
हौं तौ नैंक उठौं न उठाये, तुम बल कर हठ भुजन भरौ री॥ [2]
हौं तौ सब विधि अधम अपावन, तुम तौ आपनी ढरनि ढरौ री।
'भोरी' नीच सबै नीचन में, कृपा आस नित द्वार ररौं री ॥ [3]

- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (348)

हे श्री राधा! आप मेरे ऊपर कभी तो ऐसी कृपा करो कि जब आप एक कुंज से दूसरी कुंज में जाने के लिये जो रास्ता अपना रही हों, मैं उस रास्ते पर लेट जाऊँ और आपके श्रीचरण मेरे हृदय के ऊपर पड़ जाँय । [1]

मैं तो आपके श्रीचरणों से लिपट रही हों और आप झुककर हँसते हए मेरी भुजाओं को पकड़ लें। मैं तो आपके श्रीचरणों पर गिर पड़ी हों और आप मुझे उठाने का प्रयत्न कर रही हो; किन्तु जब मैं किसी भी प्रकार से उठ नहीं रही हो, तब आप पूरी ताकत के साथ जबरदस्ती मुझे उठाकर अपनी भुजाओं में भर लें। [2]

श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि मैं तो अत्यन्त गिरी हई और बहुत बडे-बडे पापों को करने वाली हूँ; किन्तु आप को तो अधमों का उद्धार करने एवं पतितों को पावन करने की अपनी प्रतिज्ञा का पालन अवश्य करना ही चाहिये। मैं तो गिरे हुए लोगों में सर्वाधिक गिरी हुई हूँ, किन्तु आपके द्वार पर पड़ी हुई, आपकी कृपा की भीख प्राप्त करने की याचना प्रतिदिन रिरिया-रिरियाकर किये जा रही हूँ। [3]