नन्द महर कै बगर तन, ऊब मेरे को जाय।
नाहक कहुं गढ़ि जायगो, हित काँटो मन पाय॥
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि नन्द महल के आँगन में अब मेरी बलाय जाय, अर्थात् मैं वहाँ बिल्कुल नहीं जाऊँगी क्योंकि वहाँ व्यर्थ ही मन रूपी चरण में प्रेम रूपी काँटा गड़ जायेगा, अर्थात् कृष्ण से प्रेम हो जायेगा।
नाहक कहुं गढ़ि जायगो, हित काँटो मन पाय॥
- श्री रसखान, रसखान रत्नावली
कोई गोपी अपनी सखी से कहती है कि नन्द महल के आँगन में अब मेरी बलाय जाय, अर्थात् मैं वहाँ बिल्कुल नहीं जाऊँगी क्योंकि वहाँ व्यर्थ ही मन रूपी चरण में प्रेम रूपी काँटा गड़ जायेगा, अर्थात् कृष्ण से प्रेम हो जायेगा।

