सुनि अहंकार भलौ न भिया ।
काहे कौं दुख सुख मानत मन, पैयत न बिना दिया ॥ [1]
बुधि विवेक भजन भरि राखत, मोहन हेरि हिया।
श्री बिहारी दास प्रभु कियौ सु मान्यौ, यों जन जानि-जिया ॥ [2]
- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (88)
हे भाई! मैं तुम्हें सत्य बता रहा हूँ कि किसी भी बात का अहंकार अच्छा नहीं होता। प्रभु के द्वारा दिए बिना, किसी को कुछ भी प्राप्त नहीं होता। अतः अपने या पराए के हानि-लाभ में तुम्हारा मन दुख-सुख क्यों मानता है? [1]
श्री श्यामा कुंजबिहारी की मोहिनी छबि को निरन्तर हृदय में निहारते हुए अपने विवेक और बुद्धि को सदा उनके भजन से परिपूरित रखो। श्री बिहारी जी के दास तो सब कुछ उनका किया ही समझते-मानते हैं और उसे अंगीकार कर सहज भाव से जीवन यापन करते हैं। [2]
काहे कौं दुख सुख मानत मन, पैयत न बिना दिया ॥ [1]
बुधि विवेक भजन भरि राखत, मोहन हेरि हिया।
श्री बिहारी दास प्रभु कियौ सु मान्यौ, यों जन जानि-जिया ॥ [2]
- श्री बिहारिन देव, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (88)
हे भाई! मैं तुम्हें सत्य बता रहा हूँ कि किसी भी बात का अहंकार अच्छा नहीं होता। प्रभु के द्वारा दिए बिना, किसी को कुछ भी प्राप्त नहीं होता। अतः अपने या पराए के हानि-लाभ में तुम्हारा मन दुख-सुख क्यों मानता है? [1]
श्री श्यामा कुंजबिहारी की मोहिनी छबि को निरन्तर हृदय में निहारते हुए अपने विवेक और बुद्धि को सदा उनके भजन से परिपूरित रखो। श्री बिहारी जी के दास तो सब कुछ उनका किया ही समझते-मानते हैं और उसे अंगीकार कर सहज भाव से जीवन यापन करते हैं। [2]

