मात तात जाके नहीं वृषभानु सुता नहिं नाम - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (686)

मात तात जाके नहीं वृषभानु सुता नहिं नाम - श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (686)

मात तात जाके नहीं, वृषभानु सुता नहिं नाम।
कुंजबिहारी नाम निजु, कुंज बिहारिनि बाम॥

- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, विशिष्ट पद एवं साखी (686)

स्वामी श्री हरिदास जी की अखंड नित्य विहार उपासना में श्री राधा एवं श्री कृष्ण को जन्मादि लीलाओं से पृथक सदा नित्य किशोर माना जाता है। श्री राधा का “वृषभानु दुलारी” आदि नामों से भी कोई सरोकार नहीं माना जाता क्योंकि इस उपासना में उनका कोई माँ-बाप नहीं है, वे सदा निकुंज में नित्य विहार करती हैं। यहाँ श्री कृष्ण का नाम ‘कुंजबिहारी’ है एवं श्री राधा का ‘कुंजबिहारिणी’। यहाँ ब्रज रस के गोप, गोपी, गौ, ग्वाल, मात-पिता आदि से रहित श्यामा-कुंजबिहारी की विशुद्ध निकुंज उपासना ही प्राणों का आधार है।