अब मन युगल चरन में अटक्यो - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी

अब मन युगल चरन में अटक्यो - श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी

अब मन युगल चरन में अटक्यो।
जन्म अनेक भये या जग में, धर्म कर्म में भटक्यो ॥ [1]
कृपा करी श्री नित्य किशोरी, विपन राज में ठटक्यो।
रसिकन के संग रहस केलि सुनि, हिय आनंद में लटक्यो॥ [2]
पायो मारग प्रेम प्रीति को, चित कौ संषय सटक्यो।
अली माधुरी भई नचीता, दूर भयो भव खटक्यो॥ [3]

- श्री अली माधुरी जी, श्री निकुञ्ज केली माधुरी

अब मेरा मन श्री राधा-कृष्ण के युगल चरणों में अटक गया है। इस संसार में मैंने अनगिनत जन्म लिए और धर्म-कर्म की उलझनों में भटकता रहा। [1]

परंतु अब नित्य किशोरी श्री राधा जू ने मुझ पर कृपा की और मुझे वृन्दावन का वास प्रदान किया। जब से रसिक जनों के संग में रहकर मैंने श्यामा-श्याम की रहस्य केलि लीलाओं का श्रवण किया, तब से मेरा हृदय आनंद में झूल रहा है। [2]

अब मुझे प्रेम और प्रीति का मार्ग प्राप्त हो गया है, और मेरे चित्त का सारा संदेह मिट गया है। श्री अलीमाधुरी कहते हैं कि अब वे प्रेम माधुर्य में मग्न होकर नाच उठे हैं क्योंकि उनके संसार के समस्त मोह और बंधन नष्ट हो गए हैं। [3]