रैन रढौं पानी पियौ, पातर सीथ चुगाउं ।
श्री वृन्दावन छांडि कै, अनत न कित हूँ जाऊँ ॥
- श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (4)
चाहे मुझे रातभर धरती पर ही सोना पड़े, केवल जल पीना पड़े और रूखा-सूखा अन्न ही भोजन में मिले, फिर भी मैं वृन्दावन को कभी नहीं छोड़ूँगा।
श्री वृन्दावन छांडि कै, अनत न कित हूँ जाऊँ ॥
- श्री हित दामोदर दास, नेम बत्तीसी (4)
चाहे मुझे रातभर धरती पर ही सोना पड़े, केवल जल पीना पड़े और रूखा-सूखा अन्न ही भोजन में मिले, फिर भी मैं वृन्दावन को कभी नहीं छोड़ूँगा।

