लटकत आावत बाहाँ जोरी - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (186)

लटकत आावत बाहाँ जोरी - श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (186)

लटकत आावत बाहाँ जोरी।
फूले फूले दोउ जन सुन्दर, देखत बन घन खोरी ॥ [1]
फूलन की माला उर पहिरें, नवल स्याम नव गोरी ।
अलबेली अलि प्रानरवन दिन, अविचल भूतल जोरी ॥ [2]

- श्री अलबेली अलि, समय प्रबन्ध (186)

श्री राधा-कृष्ण बाँहों में बाँहें डालकर प्रेम से लहराती हुई चाल में आ रहे हैं । दोनों सुंदर प्रेमी (राधा और कृष्ण) खिलखिलाते हुए, एक-दूसरे का हाथ थामे, घने कुंजों में विचरण कर रहे हैं। [1]

श्री अलबेली अली कहती हैं कि उनके प्राणों की आधार यह नवल श्यामल-गौर जोड़ी, फूलों की माला धारण कर, अविचल रूप से श्री धाम वृंदावन में विराज रही है। [2]