दुर्लभ या संसार में रसभजनी रतिवान - श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (62)

दुर्लभ या संसार में रसभजनी रतिवान - श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (62)

दुर्लभ या संसार में, रसभजनी रतिवान ।
‘रूपरसिक’ ऐसे बहुत, नीरस रीस निवान॥

- श्री रूपरसिक देवाचार्य, विशिष्ट दोहा (62)

वास्तविक रस में रमे भजनानंदी रसिक का मिलना इस संसार में परम दुर्लभ है। अधिकांश लोग रस की चर्चा तो करते हैं, परंतु केवल बाह्याचार में ही उलझे रहते हैं। बाहरी तौर से वे भले ही स्वयं को रसिक दिखावें, परंतु भीतर से वे नीरस होते हैं—केवल रीति-रिवाज, विधि-विधान में ही फँसे रहते हैं।