पिय प्यारी को विहरिवो - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (298)

पिय प्यारी को विहरिवो - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (298)

पिय प्यारी को विहरिवो, राखी हीय दुराय ।
छिन छिन रोकत अधिक तऊँ, निकसि निकसि मुख जाय ॥     

- श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (298)

यद्यपि प्रिया-प्रियतम की विहार लीलाओं को हृदय में सदा छुपाकर रखना चाहिए, परंतु मैं जितना-जितना इसे हृदय में छुपाने का प्रयास करता हूँ, वे उतनी ही सहजता से मुख से प्रकट हो जाती हैं।