(राग जंगला)
स्वामिनि हौं पतितन शिरताज।
तेरी जगत कहाय बिमुख ज्यों, डोलत लगत न लाज॥ [1]
श्रीवन बेगि बसाय उबारो, नाहिंन परम अकाज।
ललिताकिशोरी बिषे सिंधु महं, बूडत वैस जहाज॥ [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (81)
हे स्वामिनी, मैं पतितों में सिरताज हूँ। इस जगत में मैं तुम्हारी कहलाती हूँ, परंतु फिर भी विमुखों की भाँति इधर-उधर भटक रही हूँ और कोई लज्जा तक नहीं आती। [1]
हे राधे! मुझे शीघ्र श्री वृंदावन में बसाकर मेरा उद्धार कीजिए। यह कृपा कोई व्यर्थ कार्य नहीं होगी — यह अत्यंत कल्याणकारी कार्य है। श्री ललित किशोरी कहती हैं कि हे किशोरीजी! मैं तो विषय रूपी समुद्र में पूर्ण रूप से उसी प्रकार डूब रही हूँ जैसे कोई जहाज़ पानी में डूब रहा हो। [2]
स्वामिनि हौं पतितन शिरताज।
तेरी जगत कहाय बिमुख ज्यों, डोलत लगत न लाज॥ [1]
श्रीवन बेगि बसाय उबारो, नाहिंन परम अकाज।
ललिताकिशोरी बिषे सिंधु महं, बूडत वैस जहाज॥ [2]
- श्री ललित किशोरी, अभिलाष माधुरी, विनय (81)
हे स्वामिनी, मैं पतितों में सिरताज हूँ। इस जगत में मैं तुम्हारी कहलाती हूँ, परंतु फिर भी विमुखों की भाँति इधर-उधर भटक रही हूँ और कोई लज्जा तक नहीं आती। [1]
हे राधे! मुझे शीघ्र श्री वृंदावन में बसाकर मेरा उद्धार कीजिए। यह कृपा कोई व्यर्थ कार्य नहीं होगी — यह अत्यंत कल्याणकारी कार्य है। श्री ललित किशोरी कहती हैं कि हे किशोरीजी! मैं तो विषय रूपी समुद्र में पूर्ण रूप से उसी प्रकार डूब रही हूँ जैसे कोई जहाज़ पानी में डूब रहा हो। [2]

