कल कुण्डल केकी किरीट लसै - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

कल कुण्डल केकी किरीट लसै - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

(सवैया)
कल कुण्डल केकी किरीट लसै,
कल कुञ्जित केश सँवारी की जय-जय। [1]
मुख देखत ही दुख दूर भये,
मुसिकान मनोहर धारी की जय-जय॥ [2]
जय हो कमला-कुच कुंकुम की,
जय केशव कुंज बिहारी की जय-जय। [3]
जग पूषण कृष्ण मुरारी की जै,
ब्रज भूषण बाँके बिहारी की जय-जय॥ [4]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’

जिनके कानों में सुंदर कुंडल और मस्तक पर मयूर-मुकुट सुशोभित है, तथा जो अपने सुंदर घुँघराले केशों को अत्यंत मनोहर ढंग से सँवारते हैं, उन साँवरे सलोने श्री कृष्ण की बार-बार जय-जयकार हो। [1]

जिनका परम पावन मुखमंडल देखते ही हृदय के समस्त दुःख-कष्ट पल भर में दूर हो जाते हैं, और जो अपने मुख पर अत्यंत मनमोहिनी मुस्कान धारण किए रहते हैं, उनकी बार-बार जय-जयकार हो। [2]

लक्ष्मी जी के हृदय पर सुशोभित कुंकुम से अंकित होने वाले, और निभृत कुंजों में निरंतर विहार करने वाले रसराज श्री केशव कुंज बिहारी की सर्वदा जय-जयकार हो। [3]

संपूर्ण जगत् का पोषण करने वाले परम दयालु श्री कृष्ण मुरारी की जय हो, और संपूर्ण ब्रजमंडल के आभूषण श्री बाँके बिहारी जी की बार-बार जय-जयकार हो। [4]