नैंना प्रगट करत पिय प्रेमैं  - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (24)

नैंना प्रगट करत पिय प्रेमैं - श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (24)

(राग सारंग)
नैंना प्रगट करत पिय प्रेमैं ।
झूठें हीं ऊतर कत ठानति,
छाँड़ि मान के नेमैं ॥ [1]
कोप कपट कौ अधर कंप सखी,
अति हुलास हृदै मैं।
श्रीबीठलविपुल बिहारी नग बर,
जटित सु तुव तन हेमैं॥ [2]

- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (24)

श्रीविपुलबिहारिनदासीजी श्री राधा से कह रही हैं कि आपके नेत्रों में तो प्रियतम के प्रति प्रेम स्पष्ट झलक रहा है। क्यों झूठमूठ में उत्तर प्रति-उत्तर देकर हमें आप बहकाने की चेष्टा कर रही हैं, इस मान का परित्याग करें। [1]

आपका यह कोप तो कपट का है इसके कारण यद्यपि आपके अधर कम्पायमान हो रहे हैं, पर हृदय में उनसे मिलन का उल्लास तो दीप्त हो रहा है। आप तो हमारे लाल के साथ ऐसे शोभित हैं, जैसे आपके स्वर्ण-तन में लाल नग की भाँति जड़े हों। आप दोनों पृथक हैं कहाँ ? [2]