(कवित्त)
प्यारी जू तिहारे पद पंकज की बलिहारी,
सदाँ ही बिहारी लाल मन ते न टारै हैं। [1]
वे हरत कुसुम पराग तबै लागैं जबै हेर,
अलबेले पीत पट की सों झारै हैं॥ [2]
जावक बनाय चित्र सुखमा विचित्र हेर,
लूटत मयूर पिच्छ प्रान धन वारै हैं। [3]
हित ध्रुव रस यह सबन तें दुर्लभ है,
रसिक सु ‘बलबीर’ दासी उर धारै हैं॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, विप्रलब्धा (9)
हे श्री राधाजू! मैं आपके चरण कमलों पर बार बार बलिहारी जाती हूँ। श्रीकृष्ण सदा आपके चरणों के ही चिंतन में रमे रहते हैं, उनके हृदय से आपके श्री चरण एक क्षण के लिए भी नहीं निकलते । [1]
जब आप वन में विचरण करती हैं और आपके चरणों में पुष्पों का पराग लग जाता है, तब श्रीकृष्ण अपने पीतांबर से उन्हें धीरे-धीरे पोंछते हैं। [2]
जब वे इन चरणों पर जावक से चित्र रचना करते हैं, तब वे बार-बार उस अनुपम सौंदर्य को निहारते हैं और अपने प्राणों को वारते हुए, अपनी मयूर-चन्द्रिका इन्हीं चरणों पर विलुण्ठित करने लगते हैं । [3]
रसिक श्री लाल बलबीर दासी कहती हैं कि उनके हृदय में भी सदा यही चरण वास करते हैं, जिनके रस को श्री हितध्रुवदास जी ने परम दुर्लभ कहा है। [4]
प्यारी जू तिहारे पद पंकज की बलिहारी,
सदाँ ही बिहारी लाल मन ते न टारै हैं। [1]
वे हरत कुसुम पराग तबै लागैं जबै हेर,
अलबेले पीत पट की सों झारै हैं॥ [2]
जावक बनाय चित्र सुखमा विचित्र हेर,
लूटत मयूर पिच्छ प्रान धन वारै हैं। [3]
हित ध्रुव रस यह सबन तें दुर्लभ है,
रसिक सु ‘बलबीर’ दासी उर धारै हैं॥ [4]
- श्री लाल बलबीर, ब्रज बिनोद, विप्रलब्धा (9)
हे श्री राधाजू! मैं आपके चरण कमलों पर बार बार बलिहारी जाती हूँ। श्रीकृष्ण सदा आपके चरणों के ही चिंतन में रमे रहते हैं, उनके हृदय से आपके श्री चरण एक क्षण के लिए भी नहीं निकलते । [1]
जब आप वन में विचरण करती हैं और आपके चरणों में पुष्पों का पराग लग जाता है, तब श्रीकृष्ण अपने पीतांबर से उन्हें धीरे-धीरे पोंछते हैं। [2]
जब वे इन चरणों पर जावक से चित्र रचना करते हैं, तब वे बार-बार उस अनुपम सौंदर्य को निहारते हैं और अपने प्राणों को वारते हुए, अपनी मयूर-चन्द्रिका इन्हीं चरणों पर विलुण्ठित करने लगते हैं । [3]
रसिक श्री लाल बलबीर दासी कहती हैं कि उनके हृदय में भी सदा यही चरण वास करते हैं, जिनके रस को श्री हितध्रुवदास जी ने परम दुर्लभ कहा है। [4]

