अहो नवलाल पिय विनय सुन लीजिये।
वास वृन्दाविपिन टहल श्रीकुंज की सोहनी,
आदि मोहि कृपा करि दीजिये ॥ [1]
और कछु ना चहौं मुक्ति बैकुंठ लौं,
रूपरस माधुरी पान करि जीजिये ॥ [2]
परी भव जलधि में पार पावत नहीं,
धुनत शिरनाथ बलिदया टुक कीजिये ॥ [3]
रामसखी शरण पै दृष्टि करुणा करो,
भइ अति विकल सब गयो बल छीजिये ॥ [4]
- श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
हे नवलाल (श्री लाडली लाल)! कृपया मेरी विनती सुनिए और मुझे श्रीवृंदावन का वास एवं वाहन की कुंजों की सोहनी सेवा करने का अवसर दीजिए। [1]
मैं मोक्ष या बैकुंठ की कामना नहीं करता — केवल आपके रूपरस की मधुरता को पान करना चाहता हूँ। [2]
हे प्रभु! मैं संसार-सागर में डूबा हुआ हूँ, हताश होकर आपसे विनय कर रहा हूँ, अब मुझ पर थोड़ी कृपा कीजिए। [3]
श्री रामसखी कहती हैं, मैं आपकी शरण में आया हूँ — कृपा कर मुझपर करुणा की दृष्टि कीजिए । मैं अत्यंत व्याकुल हूँ, और मेरा अपना कोई बल नहीं है । [4]
वास वृन्दाविपिन टहल श्रीकुंज की सोहनी,
आदि मोहि कृपा करि दीजिये ॥ [1]
और कछु ना चहौं मुक्ति बैकुंठ लौं,
रूपरस माधुरी पान करि जीजिये ॥ [2]
परी भव जलधि में पार पावत नहीं,
धुनत शिरनाथ बलिदया टुक कीजिये ॥ [3]
रामसखी शरण पै दृष्टि करुणा करो,
भइ अति विकल सब गयो बल छीजिये ॥ [4]
- श्री रामसखीजी महाराज, श्री भक्तिरस मंजरी
हे नवलाल (श्री लाडली लाल)! कृपया मेरी विनती सुनिए और मुझे श्रीवृंदावन का वास एवं वाहन की कुंजों की सोहनी सेवा करने का अवसर दीजिए। [1]
मैं मोक्ष या बैकुंठ की कामना नहीं करता — केवल आपके रूपरस की मधुरता को पान करना चाहता हूँ। [2]
हे प्रभु! मैं संसार-सागर में डूबा हुआ हूँ, हताश होकर आपसे विनय कर रहा हूँ, अब मुझ पर थोड़ी कृपा कीजिए। [3]
श्री रामसखी कहती हैं, मैं आपकी शरण में आया हूँ — कृपा कर मुझपर करुणा की दृष्टि कीजिए । मैं अत्यंत व्याकुल हूँ, और मेरा अपना कोई बल नहीं है । [4]

