जेतो अन्तर बास में, तेतौ जानि उपास।
श्रीबिहारीदास कछु साँच है, कछु कछु लोभ लिबास॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (603)
श्री वृन्दावन धाम की प्राप्ति साक्षात् इष्ट की प्राप्ति ही है। जितना हम श्री वृंदावन धाम वास से पृथक हैं, उतना ही हम अपने उपास्य तत्व से भी विलग हैं। फिर भी यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि "हम तो इतने दिन से श्री वृन्दावन धाम में वास करते हैं, तो हमें तो ऐसा अनुभव नहीं हुआ," तो श्री बिहारिन देव कहते हैं कि "हे भाई! तुम्हारा वास कुछ-कुछ तो सच्चा है, और कुछ तुमने मन में लोभ-लालच संजो रखे हैं, इसीलिए तुम्हें यह अनुभव नहीं हो रहा। अन्यथा वृंदावन की प्राप्ति साक्षात् इष्ट की प्राप्ति है।"
श्रीबिहारीदास कछु साँच है, कछु कछु लोभ लिबास॥
- श्री बिहारिन देव जी, श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धान्त की साखी (603)
श्री वृन्दावन धाम की प्राप्ति साक्षात् इष्ट की प्राप्ति ही है। जितना हम श्री वृंदावन धाम वास से पृथक हैं, उतना ही हम अपने उपास्य तत्व से भी विलग हैं। फिर भी यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि "हम तो इतने दिन से श्री वृन्दावन धाम में वास करते हैं, तो हमें तो ऐसा अनुभव नहीं हुआ," तो श्री बिहारिन देव कहते हैं कि "हे भाई! तुम्हारा वास कुछ-कुछ तो सच्चा है, और कुछ तुमने मन में लोभ-लालच संजो रखे हैं, इसीलिए तुम्हें यह अनुभव नहीं हो रहा। अन्यथा वृंदावन की प्राप्ति साक्षात् इष्ट की प्राप्ति है।"

