कमल से लोइन ललित अति शोभा देत - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (273)

कमल से लोइन ललित अति शोभा देत - श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (273)

(कवित्त)
कमल से लोइन ललित अति शोभा देत,
कुंवर के संग तौ विराजें कोटि कामिनी । [1]
अपने अपने कर जोर जुरि ठाड़ी भई,
चहुँ ओर मानों घन घेरो आय दामिनी ॥ [2]
रूप गुन गान रस एक एक ते सरस,
निर्तन सकल नाना भाइन सों भामिनी । [3]
रस सीम रास सीम परम विलास सीम,
राजे रास मंडल में माधुरी की स्वामिनी ॥ [4]

- श्री माधुरी दास, वंशीवट माधुरी (273)

कमल समान नेत्रों वाली श्रीराधा जू, अत्यंत लावण्यमयी छवि से, श्रीकृष्ण के संग विराजमान हैं, और करोड़ों कामिनियाँ भी उनके सौंदर्य के आगे फीकी लगती हैं। [1]

प्रिया प्रियतम के चारों ओर सखियाँ घेरा बनाकर हाथ जोड़कर खड़ी हैं, ऐसा लग रहा है मानो घने बादलों के बीच बिजली चमक रही हो। [2]

हर सखी रूप, गान और गुण की रस-धारा से सराबोर है और अपनी-अपनी शैली में नृत्य कर रही हैं। [3]

श्री माधुरी दास कहते हैं कि उनकी स्वामिनी श्रीराधा स्वयं रस, रास और विलास की सीमा हैं, और वंशीवट स्थित रास मंडल में अद्भुत छटा से विराज रही हैं। [4]