रक्षा करी न जीव की दियो न आदर दान - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (137)

रक्षा करी न जीव की दियो न आदर दान - श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (137)

नारायण घाटी कठिन, जहां नेह को धाम।
बिकल मूर्च्छा सिसकिबौ, यह मग में विश्राम ॥

- श्री नारायण स्वामी, अनुराग रस (137)

दिव्य प्रेम रूपी परम धाम की ओर ले जाने वाला यह संकीर्ण पथ अत्यंत कठिन है। इसमें चलने वालों को विश्राम केवल विकलता, मूर्छा या रुदन-सिसकियों के क्षणों में ही प्राप्त होता है।