जब दांत न थे तब दूध दियो - ब्रज के सवैया

जब दांत न थे तब दूध दियो - ब्रज के सवैया

(सवैया)
जब दांत न थे तब दूध दियो,  दांत दिये तो कों अन्न हू देहै । [1]
जल में थल में पशु पक्षिन में,  सबकी सुधि लेत वो तेरी हू लैहै ॥ [2]
जान को देत अजान को देत,  जहान को देत वे तोकों भी दैहै । [3]
रे मनमूरख सोच करै क्यूं,  सोच करे कछू हाथ न ऐहै ॥ [4]

- ब्रज के सवैया

जब तू शिशु था, तब परमात्मा ने दूध दिया, और जैसे ही तू बड़ा हुआ और दाँत आए, तब उसने अन्न भी दिया। [1]

वह ईश्वर जल-थल के प्राणियों, पशु-पक्षियों — सबका ध्यान रखता है, तो तेरी भी सुध अवश्य लेगा। [2]

जो ईश्वर को जानता है उसे भी वह देता है, जो नहीं जानता उसे भी — वह पूरे संसार को देता है, तो तुझे भी देगा ही। [3]

हे मूर्ख मन! तू व्यर्थ चिंता क्यों करता है? चिंता करने से कुछ भी प्राप्त नहीं होता। [4]