प्रेम मगन जे साधवा, विचरत रहत निसंक।
हरि रस के माते ‘दया’, गिनैं राव न रंक ॥
- श्री दयाबाई
जो साधु श्रीहरि के प्रेम में लीन होते हैं, वे सदा निडर होकर विचरण करते हैं। वे भगवान के रस में इतने सराबोर रहते हैं कि राजा और रंक में कोई अंतर नहीं समझते।
हरि रस के माते ‘दया’, गिनैं राव न रंक ॥
- श्री दयाबाई
जो साधु श्रीहरि के प्रेम में लीन होते हैं, वे सदा निडर होकर विचरण करते हैं। वे भगवान के रस में इतने सराबोर रहते हैं कि राजा और रंक में कोई अंतर नहीं समझते।

