(राग हमीर ताल तिताला)
बस गये नैनन माँहि बिहारी ॥
देखी जबसे श्यामलि मूरति, टरत न छबि दृग टारी ।
मोर मुकुट मकराकृत कुंडल, बाम अंग श्री प्यारी ॥ [1]
प्रेम भक्ति दीजै मुहि स्वामी, अपनी ओर निहारी ।
रूपकुंवरि रानी के साधहु, कारज सकल मुरारी ॥ [2]
- रूप कुँवरि जी
बांके बिहारी की सुंदर छवि मेरी नेत्रों में समा गई है। जब से उस श्यामवर्ण मूर्ति को देखा, तब से वे छवि मेरे नेत्रों से हटती ही नहीं। उनके सिर पर मोरपंख का मुकुट है, कानों में मगर की आकृति वाले कुंडल हैं, और बाईं ओर श्री प्यारी श्रीराधा विराजमान हैं। [1]
हे स्वामी! मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि डाल कर मुझे प्रेमा-भक्ति प्रदान कीजिए । रूप कुँवरि कहतीं हैं कि श्री बांके बिहारी ही सच्चे हितैषी हैं जो अपने भक्तों के समस्त कार्यों को पूर्ण करने वाले हैं । [2]
बस गये नैनन माँहि बिहारी ॥
देखी जबसे श्यामलि मूरति, टरत न छबि दृग टारी ।
मोर मुकुट मकराकृत कुंडल, बाम अंग श्री प्यारी ॥ [1]
प्रेम भक्ति दीजै मुहि स्वामी, अपनी ओर निहारी ।
रूपकुंवरि रानी के साधहु, कारज सकल मुरारी ॥ [2]
- रूप कुँवरि जी
बांके बिहारी की सुंदर छवि मेरी नेत्रों में समा गई है। जब से उस श्यामवर्ण मूर्ति को देखा, तब से वे छवि मेरे नेत्रों से हटती ही नहीं। उनके सिर पर मोरपंख का मुकुट है, कानों में मगर की आकृति वाले कुंडल हैं, और बाईं ओर श्री प्यारी श्रीराधा विराजमान हैं। [1]
हे स्वामी! मुझ पर अपनी कृपा दृष्टि डाल कर मुझे प्रेमा-भक्ति प्रदान कीजिए । रूप कुँवरि कहतीं हैं कि श्री बांके बिहारी ही सच्चे हितैषी हैं जो अपने भक्तों के समस्त कार्यों को पूर्ण करने वाले हैं । [2]

