जयति जयति राधा प्रेमसारैरगाधा, जयति जयति कृष्णस्तद्भसापारतृष्णः ।
जयति जयति वृन्दं सत्सखीनां द्वयैक्यं, जयति जयति वृन्दाकाननं तत्स्वधाम ॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (9.45)
अगाध प्रेमसार-रूपिणी श्रीराधा की जय हो, जय हो ; उन राधा-रस के लिए अपार तृषातुर श्रीकृष्ण की जय हो, जय हो ; इन युगल के मिलाप की आकांक्षा करने वाली सखीवृन्दों की जय हो, जय हो; एवं उनके निज-धाम श्रीवृन्दावनकी जय हो, जय हो।
जयति जयति वृन्दं सत्सखीनां द्वयैक्यं, जयति जयति वृन्दाकाननं तत्स्वधाम ॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (9.45)
अगाध प्रेमसार-रूपिणी श्रीराधा की जय हो, जय हो ; उन राधा-रस के लिए अपार तृषातुर श्रीकृष्ण की जय हो, जय हो ; इन युगल के मिलाप की आकांक्षा करने वाली सखीवृन्दों की जय हो, जय हो; एवं उनके निज-धाम श्रीवृन्दावनकी जय हो, जय हो।

