मेरौ लाल स्यामा रंग भीनौं - श्री ठाकुर दास जी

मेरौ लाल स्यामा रंग भीनौं - श्री ठाकुर दास जी

मेरौ लाल स्यामा रंग भीनौं ।
बोलत नाँहिं प्रिया तू मुख तें, कै काहू कछु कीनौं ॥ [1]
मैं प्यारी तेरे चरननि लोटूँ, तिहिं मोल मोहिं लीनौं ।
ठाकुर सखी रीझि हँसि प्रिया, स्याम अंक भरि लीनौं ॥ [2]

- श्री ठाकुर दास, श्री ठाकुर दास जी की वाणी, पद (2)

हे श्यामा जू (श्री राधा)! मेरा लाल (श्री कृष्ण) तो आपके ही रंग में रंगा हुआ है। तुम अपने मुख से कुछ बोलती क्यों नहीं, क्या लाल ने कुछ किया है? [1]

श्यामसुंदर विनती करते हैं — “प्रिये! मैं तो तुम्हारे चरणों में लोटूँ, तूने अपने अपार प्रेम के मूल्य पर मुझे अपना बना लिया है।” ठाकुर सखी कहती हैं कि तब प्रिया जी रीझकर हँस पड़ती हैं एवं श्यामसुंदर को हृदय से लगा लेती हैं। [2]