प्रीतम मोहि प्रानन हूँ तें प्यारौ ।
निसिदिन उर लगायें रहौं हित सौं,
नैंक न करिहौं न्यारौ ॥ [1]
देखत जाय परम सुख उपजत,
रूप-रंग-गुन गारौ ।
जै श्रीकमलनैंन हित सुनि प्रिय बैंननि,
तन-मन-धन सब वारौ॥ [2]
- श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (110)
श्री राधा कहती हैं - प्रियतम मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। मैं प्रेम से रात-दिन उन्हें हृदय से लगाये रहती हूँ। किंचित् भी अपने से दूर नहीं करती। [1]
उनको देखते ही परम सुख उत्पन्न होता है, वे रूप-रंग-आनन्द और गुणों के आगार हैं । गोस्वामी श्री कमलनयनजी महाराज कहते हैं कि ऐसी प्रियवाणी सुनकर तन-मन-धन सब बार देना चाहिये । [2]
निसिदिन उर लगायें रहौं हित सौं,
नैंक न करिहौं न्यारौ ॥ [1]
देखत जाय परम सुख उपजत,
रूप-रंग-गुन गारौ ।
जै श्रीकमलनैंन हित सुनि प्रिय बैंननि,
तन-मन-धन सब वारौ॥ [2]
- श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (110)
श्री राधा कहती हैं - प्रियतम मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। मैं प्रेम से रात-दिन उन्हें हृदय से लगाये रहती हूँ। किंचित् भी अपने से दूर नहीं करती। [1]
उनको देखते ही परम सुख उत्पन्न होता है, वे रूप-रंग-आनन्द और गुणों के आगार हैं । गोस्वामी श्री कमलनयनजी महाराज कहते हैं कि ऐसी प्रियवाणी सुनकर तन-मन-धन सब बार देना चाहिये । [2]

