चातिक चुहल चहुँ ओर चाहै स्वाति - घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (187)

चातिक चुहल चहुँ ओर चाहै स्वाति - घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (187)

(कवित्त)
चातिक चुहल चहुँ ओर चाहै स्वाति ही कों,
सूरे पन-पूरे जिन्हें बिष सम अमी है। [1]
प्रफुलित होत भान के उदोत कंज-पुंज,
ता बिन बिचारनि ही जोति-जाल तमी है। [2]
चाहौ अनचाहौ जान प्यारे पै अनंदघन,
प्रीति-रीति बिषम सु रोम रोम रमी है। [3]
मोहिं तुम एक, तुम्हें मो सम अनेक आहिं,
कहा कछू चंदहिं चकोरन की कमी है॥ [4]

- श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (187)

विनोदी स्वभाव का चातक पक्षी संसार भर के जल को त्यागकर केवल स्वाति की बूंद ही चाहता है — वह अपने प्रण का ऐसा पालनकर्ता है कि अमृत भी उसके लिए विष बन जाता है। [1]

कमलों का समूह सूर्य के उदित होने पर प्रफुल्लित होता है, उसके अभाव में उन बेचारों को ज्योति का भण्डार भी रात्रि जैसा लगता है। [2]

श्री घनानन्द कहते हैं कि हे प्रियतम सुजान (श्री कृष्ण) ! (तुम) चाहे प्रेम करो, चाहे प्रेम न करो, किन्तू मेरे तो रोम-रोम में प्रेम की विषम रीति वसी हई है। [3]

मेरे लिए प्रिय तुम ही एकमात्र हो, किन्तु तुम्हारे लिए मेरे जैसे कई होंगे — जैसे चकोर के लिए चाँद ही एक है, पर चाँद के लिए चकोरों की कोई कमी नहीं। [4]