श्री वृन्दावन रानी साहिबनी ।
स्वामिनी चरन कमल की सेवा, हमको भली ठनी ॥ [1]
ललितादिक सखियन सों मित्रता, हौंहू तो या पात गनी।
जुगल रसिक रस जय श्री बंसीअलि, जानत क्योंहू ना मुख जात भनी ॥ [2]
- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (14)
श्री वृन्दावन धाम की साहिबनी (मालकिन) श्री राधा हैं । ऐसी स्वामिनी के श्री चरणकमलों की सेवा हमें भली प्रकार से जम गई है । [1]
फिर यदि ललिता आदि सखियों की स्नेहमयी संगति मिल जाए, तो इससे बढ़कर कुछ नहीं। श्री वंशीअलि कहते हैं कि युगल विहार रस जिसे अनन्य रसिकों ने अपने हृदय में धारण किया है, वह अत्यंत दुर्लभ और वाणी के परे है। । [2]
स्वामिनी चरन कमल की सेवा, हमको भली ठनी ॥ [1]
ललितादिक सखियन सों मित्रता, हौंहू तो या पात गनी।
जुगल रसिक रस जय श्री बंसीअलि, जानत क्योंहू ना मुख जात भनी ॥ [2]
- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (14)
श्री वृन्दावन धाम की साहिबनी (मालकिन) श्री राधा हैं । ऐसी स्वामिनी के श्री चरणकमलों की सेवा हमें भली प्रकार से जम गई है । [1]
फिर यदि ललिता आदि सखियों की स्नेहमयी संगति मिल जाए, तो इससे बढ़कर कुछ नहीं। श्री वंशीअलि कहते हैं कि युगल विहार रस जिसे अनन्य रसिकों ने अपने हृदय में धारण किया है, वह अत्यंत दुर्लभ और वाणी के परे है। । [2]

