सुर-नर-किन्नर-उरग हू  - श्री ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (6)

सुर-नर-किन्नर-उरग हू - श्री ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज शृंगार (6)

सुर-नर-किन्नर-उरग हू, कहत रहैं यह बैन।
धन्य हमारौ भाग जौ, कहुँ पावैं ब्रज-रैन ॥

- श्री ब्रज निधि जी, ब्रज निधि ग्रंथावली, ब्रज श्रृंगार (6)

चाहे देवता हों या मनुष्य, किन्नर हों या नाग — सभी प्राणी यही कहते हैं कि यदि उन्हें ब्रज की रेणु (रज) मिल जाए, तो उनका जीवन धन्य हो जाए और उनका भाग्य सफल कहलाए।