गुञ्ज गरें सिर मोरपखा - श्री रसखान, रसखान रत्नावली

गुञ्ज गरें सिर मोरपखा - श्री रसखान, रसखान रत्नावली

(सवैया)
गुञ्ज गरें सिर मोरपखा अरु चाल गयंद की मो मन भावै । [1]
साँवरो नन्द कुमार सबै  ब्रजमण्डल में ब्रजराज कहावै ॥ [2]
साज समाज सबै सिरताज, औ लाज की बात नहीं कही आवै। [3]
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावै ॥ [4]

- श्री रसखान, रसखान रत्नावली

श्रीकृष्ण ने सुंदर गुंजा-माला और मोर-मुकुट धारण किया है, और उनकी मतवाली, गजराज-सी चाल मेरे मन को मोह लेती है। [1]

श्यामसुंदर सम्पूर्ण व्रजभूमि में ब्रजराज के रूप में प्रसिद्ध हैं। [2]

वे सम्पूर्ण व्रज के सिरताज हैं, जिनको शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। [3]

उन्हीं परम मनोहर भगवान श्री कृष्ण को ब्रज की गोपियाँ एक कटोरा छाछ पर नचा रही हैं। [4]