गिरि-पति लागी मेरु - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (96)

गिरि-पति लागी मेरु - श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (96)

(कवित्त)
गिरि-पति लागी मेरु मेरुपति लागी भूमि,
भूमिपति सेस-कोल कच्छ नीर चारी सौं। [1]
दिगपति लागी दिगपालन के हाथ हठी,
सुरपति लागी सुरपाल छत्रधारी सौं॥ [2]
दानपति करन करन पति लागी बलि,
बलिपति लागी कैलास के विहारी सौं। [3]
तीनों लोकपति ब्रजपति सौ लागी है,
ब्रजपति पति लागी वृषभान की दुलारी सौं॥ [4]

- श्री हठी जी, श्री राधा सुधा शतक (96)

पर्वतराज हिमालय स्वयं मेरु पर्वत के अधीन हैं। मेरु पर्वत पृथ्वी के अधीन है। पृथ्वी का आधार शेषनाग, वराह, कच्छप और जलमय स्वरूप हैं — अतः पृथ्वी इन आधारों के अधीन है। [1]

दिशाएँ अपने दिग्पालों (जैसे इन्द्र, यम, वरुण आदि) के अधीन हैं। देवताओं का अधिपति इन्द्र भी अन्य उच्च देवताधिपतियों के अधीन है। [2]

दान के अधिपति कर्ण, और राजा बलि जैसे दानवीर आदि कैलाश पति शिवजी जैसे सर्वोच्च महादेव के अधीन हैं। [3]

तीनों लोकों के स्वामी ब्रह्मा, विष्णु, शंकर आदि ब्रजपति श्रीकृष्ण के अधीन हैं, और वे श्रीकृष्ण वृषभानु नंदिनी श्रीराधा रानी के अधीन हैं। [4]