हम भूखे ब्रज की गारी के।
वारत निज बैकुण्ठ लोक-सुख, सुनि सुनि गारी 'दारी के'॥ [1]
भाव न मो कहँ नेकहुँ अस्तुति, महावाक्य श्रुति चारी के।
होत विभोर सुनत ब्रजनारिन, वाक्यन चोरी जारी के॥ [2]
भाव न मो कहँ चरण समर्चन, पद्मा सी घरवारी के।
मोहिं 'कृपालु' तो चरण पलोटन, भावत भानुदुलारी के ॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (132)
भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं कि हमें ब्रज की प्यार की गालियाँ अत्यंत ही अच्छी लगती हैं। 'दारी के' इस गाली को सुन-सुन कर मैं अपने बैकुण्ठ लोक के सुख को न्यौछावर करते हुए बलिहार जाता हूँ। [1]
मुझे चारों वेदों के महावाक्यों द्वारा की हुई स्तुति किंचित भी अच्छी नहीं लगती। किन्तु ब्रजांगनाओं के प्यार भरे 'चोरी जारी के' वाक्यों को सुनकर आनन्द विभोर हो जाता हूँ। [2]
मुझे महालक्ष्मी सरीखी अर्धांगिनी के द्वारा की हुई चरण पूजा नहीं अच्छी लगती। श्री कृपालु जी कहते हैं कि मैं तो वृषभानुनन्दिनी श्री राधा के चरणों को दबाने में ही अपना सौभाग्य समझता हूँ। [3]
वारत निज बैकुण्ठ लोक-सुख, सुनि सुनि गारी 'दारी के'॥ [1]
भाव न मो कहँ नेकहुँ अस्तुति, महावाक्य श्रुति चारी के।
होत विभोर सुनत ब्रजनारिन, वाक्यन चोरी जारी के॥ [2]
भाव न मो कहँ चरण समर्चन, पद्मा सी घरवारी के।
मोहिं 'कृपालु' तो चरण पलोटन, भावत भानुदुलारी के ॥ [3]
- जगद्गुरु श्री कृपालुजी महाराज, प्रेम रस मदिरा, सिद्धांत माधुरी (132)
भगवान् श्री कृष्ण कहते हैं कि हमें ब्रज की प्यार की गालियाँ अत्यंत ही अच्छी लगती हैं। 'दारी के' इस गाली को सुन-सुन कर मैं अपने बैकुण्ठ लोक के सुख को न्यौछावर करते हुए बलिहार जाता हूँ। [1]
मुझे चारों वेदों के महावाक्यों द्वारा की हुई स्तुति किंचित भी अच्छी नहीं लगती। किन्तु ब्रजांगनाओं के प्यार भरे 'चोरी जारी के' वाक्यों को सुनकर आनन्द विभोर हो जाता हूँ। [2]
मुझे महालक्ष्मी सरीखी अर्धांगिनी के द्वारा की हुई चरण पूजा नहीं अच्छी लगती। श्री कृपालु जी कहते हैं कि मैं तो वृषभानुनन्दिनी श्री राधा के चरणों को दबाने में ही अपना सौभाग्य समझता हूँ। [3]

